कुमाऊं की महिलाओं और संस्कृति पर अपमानजनक टिप्पणी: समाज में रोष, सांस्कृतिक संस्थाओं से बहिष्कार की मांग..

हल्द्वानी- अपने आप को “ज्योति अधिकार” कहने वाली एक महिला द्वारा कुमाऊँ की महिलाओं, देवी-देवताओं और लोकसंस्कृति को लेकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों से पूरे कुमाऊँ में गहरा आक्रोश व्याप्त है। इन बयानों को न केवल महिलाओं की गरिमा पर सीधा हमला माना जा रहा है, बल्कि यह कुमाऊँ की सांस्कृतिक पहचान को नीचा दिखाने का प्रयास भी बताया जा रहा है।

कुमाऊँ की नारी सदियों से स्वाभिमान, संस्कार, संघर्ष और शालीनता की प्रतीक रही है। लोकपर्वों, कौतिकों और सांस्कृतिक मेलों में पारंपरिक वेश-भूषा और नृत्य के माध्यम से महिलाएं अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती हैं। ऐसे में इन आयोजनों और उनमें भाग लेने वाली महिलाओं को अपमानजनक शब्दों से संबोधित करना पूरे समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है।

समाज के बुद्धिजीवियों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और महिला संगठनों का कहना है कि किसी भी महिला द्वारा दूसरी महिलाओं का इस प्रकार अपमान किया जाना अत्यंत निंदनीय है। देवी-देवताओं और लोकआस्थाओं को “फर्जी” कहकर संबोधित करना धार्मिक और सांस्कृतिक असहिष्णुता को बढ़ावा देता है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कई सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने मांग की है कि इस तरह की भाषा और सोच रखने वालों का सामाजिक व सांस्कृतिक बहिष्कार किया जाए। उनका कहना है कि कुमाऊँ के कौतिकों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को राजनीति या व्यक्तिगत प्रचार का मंच नहीं बनने दिया जाएगा। जो लोग लोकसंस्कृति को अपमानित करते हैं, उन्हें ऐसे आयोजनों से दूर रखा जाना चाहिए।

समाज का स्पष्ट संदेश है कि कुमाऊँ की पहचान उसकी नम्रता, मधुर वाणी, सांस्कृतिक समृद्धि और महिला सम्मान से है। इस पहचान को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी प्रयास का जवाब हिंसा से नहीं, बल्कि एकजुटता, जागरूकता और लोकतांत्रिक विरोध से दिया जाएगा।

Daily Dpark 24
Author: Daily Dpark 24

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