अल्मोड़ा/पिथौरागढ़ – पर्यावरण असंतुलन, बढ़ता तापमान और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते मानवीय दबाव का असर अब हिमालय के ग्लेशियरों पर साफ दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है और इसका सीधा असर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ जल स्रोतों पर भी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने इसे भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी बताया है।
अल्मोड़ा स्थित जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन और पर्यावरण विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार पिछले दशकों में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक वर्ष 1985 से 2002 के बीच ग्लेशियरों के पिघलने की दर करीब तीन गुना तक बढ़ी। इसके बाद भी इसके और तेज होने की आशंका जताई जा रही है।
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल के अनुसार पर्यावरण असंतुलन के नकारात्मक प्रभाव अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। दुनिया में बढ़ती आबादी, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता मानवीय दबाव तापमान में वृद्धि के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव ग्लेशियरों पर पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि पूर्व में किए गए शोध के अनुसार वर्ष 1975 से 1985 के बीच ग्लेशियरों से प्रतिवर्ष करीब सात अरब टन बर्फ पिघलने का अनुमान था। वर्ष 2000 से 2010 के दौरान यह मात्रा बढ़कर करीब 20 अरब टन प्रतिवर्ष तक पहुंच गई। पिछले चार दशकों में ग्लेशियरों से करीब 440 अरब टन बर्फ पिघलने का अनुमान सामने आया है, जिसे वैज्ञानिक बेहद चिंताजनक मान रहे हैं।
पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र में उच्च हिमालय में स्थित विश्व प्रसिद्ध ओम पर्वत पर भी ग्लेशियरों के पिघलने का असर दिखाई दे रहा है। वर्तमान में पर्वत से बर्फ काफी हद तक गायब हो गई है, जिसके कारण इसका गहरा हिस्सा काला नजर आने लगा है। बर्फ की कमी के चलते ओम की विशिष्ट आकृति भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रही है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक पिछले वर्ष भी कुछ समय के लिए ओम पर्वत से बर्फ लगभग पूरी तरह गायब हो गई थी। वर्ष 2024 में भी ऐसी स्थिति सामने आई थी। तब विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने कम बर्फबारी, बढ़ते तापमान, वाहनों से होने वाले प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को इसके संभावित कारणों में शामिल किया था।
पिथौरागढ़ जिले के मल्ला जोहार क्षेत्र में स्थित मिलम ग्लेशियर भी तेजी से पीछे खिसक रहा है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आकलनों के मुताबिक पिछले करीब दो दशकों में मिलम ग्लेशियर लगभग एक किलोमीटर पीछे खिसक चुका है। ग्लेशियर के लगातार सिकुड़ने को हिमालय में बढ़ते तापमान और बर्फ के तेजी से पिघलने से जोड़कर देखा जा रहा है।
मल्ला जोहार विकास समिति के अध्यक्ष श्रीराम सिंह धर्मसक्तू ने कहा कि मिलम ग्लेशियर के पीछे खिसकने की स्थिति लगातार चिंता बढ़ा रही है। हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने के साथ बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिसका असर ग्लेशियरों के आकार और स्थिति पर पड़ रहा है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जोशी, यूकॉस्ट देहरादून ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता तापमान और पर्यावरणीय असंतुलन ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि हिमालय को सुरक्षित रखने के लिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय समुदायों और आम लोगों को मिलकर दीर्घकालिक प्रयास करने होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल हिमालयी क्षेत्रों की समस्या नहीं है। इसका प्रभाव भविष्य में नदियों के जल प्रवाह, पेयजल स्रोतों, कृषि और पूरे पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों को कम करने और पर्यावरण संरक्षण के उपायों को मजबूत करने की जरूरत है।










