हिमालयी जंगलों का दुर्लभ ‘रसपान करने वाला’ कठफोड़वा चंपावत में नजर आया

चंपावत – हिमालयी जंगलों की जैव विविधता एक बार फिर लोगों को आकर्षित कर रही है। चंपावत जिले के च्यूरा खर्क गांव में दुर्लभ रूफस-बेलीड वुडपेकर (Rufous-bellied Woodpecker) दिखाई दिया है। सिर पर लाल रंग के ताज जैसी आकृति वाला यह खूबसूरत पक्षी उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है, लेकिन इसका आसानी से नजर आना काफी दुर्लभ माना जाता है।

पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार यह कठफोड़वा मुख्य रूप से बांज और बुरांश के जंगलों में दिखाई देता है। इसे एशिया का एकमात्र वास्तविक रूप से पेड़ों का रस चूसने वाला कठफोड़वा माना जाता है। हिमालयी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी करीब 1,500 मीटर से 4,100-4,300 मीटर तक की ऊंचाई पर दर्ज की गई है। उत्तराखंड में यह सामान्य तौर पर 1,500 से 3,000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में देखा जाता है।

पेड़ के तने में छेद बनाकर पीता है रस

रूफस-बेलीड वुडपेकर की सबसे खास विशेषता उसका भोजन जुटाने का तरीका है। यह पेड़ों के तनों पर छोटे-छोटे छेदों की कतार बनाता है और फिर उन्हीं छेदों से निकलने वाले पेड़ के रस को पीने के लिए बार-बार उसी स्थान पर लौटता है।

पेड़ों से निकलने वाले इस रस का लाभ केवल रूफस-बेलीड वुडपेकर ही नहीं उठाता। रूफस सिबिया, ग्रीन-टेल्ड सनबर्ड, ग्रीन-बैक्ड टिट और व्हाइट-टेल्ड नटहैच जैसे अन्य पक्षी भी इन छेदों से निकलने वाले रस का उपयोग करते हैं।

पिछले सप्ताह पूर्व सैनिक एवं काश्तकार अमित खर्कवाल ने अपने घर के समीप इस दुर्लभ पक्षी को देखा। इसके बाद क्षेत्र में पक्षी प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों की उत्सुकता बढ़ गई है।

वसंत में पेड़ों का रस बनता है खास भोजन

पारिस्थितिकीविद् के. रामनारायण के अनुसार वसंत ऋतु में पेड़ों का रस इस पक्षी के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। इसके अलावा यह चींटियां, भृंग, कैटरपिलर, टिड्डे, झींगुर, पतंगे और मकड़ियां भी खाता है।

इसकी जीभ के सिरे पर मौजूद बारीक रेशेदार संरचनाएं पेड़ों का रस चाटने में मदद करती हैं। वहीं इसके जाइगोडैक्टिल पैर और मजबूत, कठोर पूंछ के पंख इसे पेड़ों के सीधे तनों पर मजबूती से पकड़ बनाने और आसानी से ऊपर चढ़ने में सहायता करते हैं।

हिमालय से दक्षिण-पूर्व एशिया तक है फैलाव

रूफस-बेलीड वुडपेकर का विस्तार हिमालयी क्षेत्र से लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया तक बताया जाता है। यह नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और उत्तरी भारत से लेकर दक्षिण-पूर्वी चीन, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम तक पाया जाता है। हालांकि इतना बड़ा भौगोलिक विस्तार होने के बावजूद अधिकांश क्षेत्रों में यह अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

च्यूरा खर्क में इस दुर्लभ पक्षी का दिखना क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और हिमालयी वन पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पक्षी प्रेमियों के लिए यह दृश्य किसी दुर्लभ प्राकृतिक उपहार से कम नहीं है।

Daily Dpark 24
Author: Daily Dpark 24

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