वन हमारी सांस्कृतिक धरोहर और भविष्य की सुरक्षा का आधार, प्रकृति संरक्षण में वनकर्मियों की भूमिका अतुलनीय: राज्यपाल

नैनीताल – राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) ने कहा कि वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय सुरक्षा और भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का आधार हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मानव का अस्तित्व एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है और विकसित भारत तथा विकसित उत्तराखंड का सपना तभी साकार होगा, जब विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।

मंगलवार को लोक भवन नैनीताल में उत्तराखंड वन विभाग द्वारा आयोजित ‘प्रकृति के प्रहरी’ वनकर्मी सम्मान एवं पुस्तक विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए राज्यपाल ने वन एवं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले वनकर्मियों को सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि वनकर्मी प्रकृति के सच्चे प्रहरी और हरित संपदा के सजग रक्षक हैं, जो भीषण वनाग्नि, प्राकृतिक आपदाओं और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में जुटे रहते हैं।

राज्यपाल ने कहा कि वनकर्मियों का समर्पण, साहस और सेवा भाव उत्तराखंड की हरित चेतना को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने सम्मानित वनकर्मियों को बधाई देते हुए उनके कार्यों को समाज के लिए प्रेरणादायक बताया।

इस अवसर पर राज्यपाल ने ‘राजाजी में पूर्णिमा की वह रात’, ‘Common Birds of Almora and Nainital’, ‘From Roots to Riches’ तथा ‘Beehive Fencing’ पुस्तकों का विमोचन भी किया। उन्होंने कहा कि ये पुस्तकें प्रकृति, जैव विविधता, आजीविका संवर्धन और नवाचार के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने का महत्वपूर्ण प्रयास हैं। विशेष रूप से ‘राजाजी में पूर्णिमा की वह रात’ पुस्तक प्रकृति, वन्यजीवन और मानवीय संवेदनाओं के गहरे संबंध को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है तथा पाठकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का कार्य करेगी।

राज्यपाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वनों को सदैव देवतुल्य माना गया है। हमारी सनातन परंपरा अरण्य संस्कृति की परंपरा रही है और वेदों-उपनिषदों की रचना भी वनांचलों में हुई है। उन्होंने कहा कि हमारे शास्त्रों में वृक्षों को जीवनदाता बताया गया है तथा मत्स्य पुराण में एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है, जो प्रकृति संरक्षण के महत्व को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच उत्तराखंड की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य का लगभग 71 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित है, जो इसकी समृद्ध प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है। उत्तराखंड के वन, ग्लेशियर और नदियां करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। राज्यपाल ने चिपको आंदोलन का उल्लेख करते हुए गौरा देवी और उनकी साथियों के योगदान को याद किया और कहा कि उनका संदेश आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत है।

राज्यपाल ने वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीक, नवाचार और जनसहभागिता को आवश्यक बताया। उन्होंने ‘Beehive Fencing’ जैसी वैज्ञानिक पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के साथ-साथ मधुमक्खी पालन के जरिए किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने प्रकृति संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देने और नई पीढ़ी में जल, जंगल और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने स्वागत संबोधन दिया, जबकि अपर प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. विवेक पांडेय ने भी अपने विचार रखे। इस दौरान वन एवं वन्यजीव संरक्षण विषयक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया।

समारोह में प्रमुख वन संरक्षक (कुमाऊं) डॉ. तेजस्विनी अरविंद पाटिल, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, सम्मानित वनकर्मी तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

Daily Dpark 24
Author: Daily Dpark 24

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