उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर किसान मंच का प्रहार…

ऑपरेशन स्वास्थ्य’ अभियान की घोषणा, ‘राइट टू हेल्थ बिल’ का मसौदा किया जारी — सदन में पक्ष-विपक्ष से बिल लाने की मांग

हल्द्वानी। उत्तराखंड की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर किसान मंच उत्तराखंड ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। रविवार को हल्द्वानी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच ने ‘राइट टू हेल्थ बिल’ का मसौदा मीडिया के सामने जारी किया और राज्य सरकार से इसे विधानसभा में पारित कराने की मांग की। किसान मंच ने घोषणा की कि ‘ऑपरेशन स्वास्थ्य’ नामक राज्यव्यापी जनआंदोलन चौखुटिया से शुरू होकर पूरे उत्तराखंड में फैलाया जाएगा।

CHC और उप-जिला अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी: CAG रिपोर्ट का हवाला

किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष एवं “ऑपरेशन स्वास्थ्य” के जनक कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि राज्य के अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) महज़ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। चौखुटिया CHC जैसे 30 बिस्तरों वाले अस्पताल में सिर्फ चार MBBS डॉक्टर हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में मरीजों को अन्य अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है, जिससे कई बार रास्ते में ही मौतें हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि वित्तीय संसाधन होने के बावजूद कई अस्पतालों में मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। CAG रिपोर्ट के अनुसार राज्य के CHC में डॉक्टरों का 94% और उप-जिला अस्पतालों में 45% तक अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, न उपकरण, न दवाइयाँ — भवन बने हैं पर स्वास्थ्य सेवाएँ नदारद हैं।

“स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा”

मंच ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जोड़ा गया है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे “स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार” माना है। इसलिए सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि हर नागरिक को निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

किसान मंच ने सरकार से आग्रह किया कि आगामी विधानसभा सत्र में ‘राइट टू हेल्थ बिल’ लाकर इसे कानूनी दर्जा दिया जाए, जिससे राज्य में हर नागरिक का स्वास्थ्य मौलिक अधिकार बन सके।

नेताओं ने साधा सरकार पर निशाना

मंच के प्रदेश अध्यक्ष कार्तिक उपाध्याय ने कहा,

 “उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था अपने सबसे बुरे दौर में है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीण आज भी बुनियादी इलाज से वंचित हैं। चौखुटिया, द्वाराहाट और सुयालबाड़ी के अस्पताल केवल कागजों में सक्रिय हैं।”

मंच के संरक्षक पीयूष जोशी ने कहा कि लालकुआं CHC में अब तक एक एक्स-रे मशीन तक नहीं है और इसके लिए सेंचुरी के CSR फंड से मदद मांगी जा रही है, जबकि सरकार विज्ञापनों में ही हजारों करोड़ खर्च कर रही है। उन्होंने कहा —

“जब राज्य के अस्पताल डॉक्टरों और उपकरणों से खाली हैं, तब यह शर्म की बात है कि सरकार अपने ही दावे प्रचार अभियानों में डुबो रही है।”

धन सिंह रावत के बयान पर तीखा पलटवार

मंच के प्रदेश संरक्षक पीयूष जोशी ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के उस बयान पर भी सवाल उठाया जिसमें उन्होंने कहा था — “पहले मरीज डॉक्टर को ढूंढते थे, अब डॉक्टर मरीज को ढूंढ रहे हैं।”

जोशी ने मांग की कि मंत्री बताएँ कि आखिर वे कौन से अस्पताल हैं जहाँ डॉक्टर मरीजों को ढूंढ रहे हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि मरीज इलाज के लिए डॉक्टरों को तरस रहे हैं।

अल्मोड़ा और कुमाऊँ में बड़े आंदोलन की तैयारी

मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष कमल तिवारी ने कहा कि चौखुटिया से शुरू आंदोलन अब अल्मोड़ा जिले तक पहुँचेगा। जल्द ही “ऑपरेशन स्वास्थ्य” के तहत जिला स्तर पर जनांदोलन की शुरुआत की जाएगी।

छात्र नेता संजय जोशी ने कहा कि राइट टू हेल्थ बिल पर सभी विधायक — चाहे सत्ता पक्ष हों या विपक्ष — एकजुट होकर इसे विधानसभा में लाएँ, वरना आंदोलन और तेज़ होगा।

9 नवंबर से सुयालबाड़ी में आंदोलन की शुरुआत

किसान मंच ने घोषणा की कि 9 नवंबर (राज्य स्थापना दिवस) से “ऑपरेशन स्वास्थ्य” आंदोलन की औपचारिक शुरुआत नैनीताल जिले के सुयालबाड़ी CHC में धरना-प्रदर्शन के साथ की जाएगी। इसके बाद यह अभियान पूरे कुमाऊँ और गढ़वाल में फैलेगा। मंच ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन पूर्णतः गैर-राजनीतिक और जनहितकेंद्रित होगा.

प्रस्तावित ‘राइट टू हेल्थ बिल’ के मुख्य प्रावधान

किसान मंच द्वारा जारी बिल मसौदा राजस्थान के 2022 के कानून पर आधारित है। इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं।

1. निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ:

राज्य के सभी नागरिकों को सरकारी अस्पतालों में OPD/IPD सेवाएँ, आपात चिकित्सा, आवश्यक दवाइयाँ और डायग्नोस्टिक जांचें निःशुल्क मिलेंगी।

2. निजी संस्थानों की जिम्मेदारी:

निजी अस्पतालों को आपात स्थिति में इलाज करना अनिवार्य होगा। सरकार तय दरों पर उनका भुगतान 45 दिनों में करेगी।

3. आपातकालीन सेवा से इनकार पर दंड:

कोई भी पंजीकृत अस्पताल आपातकालीन मरीज को इलाज से मना नहीं कर सकेगा। इनकार की स्थिति में भारी जुर्माना और लाइसेंस निलंबन का प्रावधान होगा।

4. निगरानी एवं शिकायत प्राधिकरण:

राज्य और जिला स्तर पर “राइट टू हेल्थ अथॉरिटी” गठित की जाएगी, जो शिकायतों का 30 दिनों में निपटारा करेगी।

5. वित्तपोषण और पारदर्शिता:

सरकार वार्षिक बजट निर्धारित करेगी और “स्थिरीकरण कोष” बनाएगी। तिमाही रिपोर्ट में खर्च, शिकायतों और निष्पादन का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाएगा।

राजनीतिक नहीं, जनहित का अभियान

मंच ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी दल विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के “स्वास्थ्य अधिकार” की आवाज़ है।

उन्होंने चेताया कि यदि राज्य सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो “स्वास्थ्य का अधिकार” 2027 के विधानसभा चुनावों में प्रमुख जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

Daily Dpark 24
Author: Daily Dpark 24

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